होलाष्टक

फाल्गुन माह में शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के 8 दिनों को ‘होलाष्टक’ कहते हैं। मान्यता है कि इन दिनों कोई शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए।

होलाष्टक की कथाऐं-होलाष्टक

होलाष्टक के बारे में कुछ कहानियाँ हैं। एक कथा है कि भगवान शिव ने शुक्ल अष्टमी पर कामदेव को नष्ट कर दिया था। इससे दुनिया उदास हो गई थी। गहन प्रार्थनाएं हुईं। पूर्णिमा के दिन, भगवान शिव ने कामदेव को जीवन प्रदान किया और दुनिया उत्सव और रंगों से आनन्दित हुई। अन्य एक लोकप्रिय कहानी कहती है कि हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को शुक्ल अष्टमी पर हिरासत में लिया था। होलिका ने प्रहलाद को नष्ट करने की तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन पूर्णिमा के दिन, वह खुद ही नष्ट हो गई। होलाष्टक के इन 8 दिनों को अशुभ माना जाता है और इन 8 दिनों के बाद होली पर, आनन्द और उत्सव शुरू होते हैं।

आत्म-मंथन-

पौराणिक कथाओं होलाष्टक के बारे में बहुत कुछ कहती हैं। हमारे लिए, हालांकि, होलाष्टक के ये 8 दिन आत्मनिरीक्षण के दिन होने चाहिए। हमें अपने भीतर की कमज़ोरियों पर विवेचना करनी चाहिए और स्वयं को बेहतर बनाना चाहिए। अपनी कमज़ोरियों को जीतने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करने का हमें संकल्प लेना चाहिए। ये 8 दिन आत्म-सुधार के लिए चिंतन और योजना बनाने के लिए हैं। होली के शुभ दिन से हमें इन योजनाओं को लागू करना चाहिए।

होलाष्टक के दौरान पूजा पाठ के लिए विषेश रूप से निर्धारित मंत्रों के समूह को ‘रक्षोघ्न मंत्र’ कहा जाता है। ये मंत्र ग्रहों के बुरे प्रभाव को खत्म करने और सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। ये मंत्र ऋग्वेद मंडल 4 और 10 में दिए गए हैं और यजुर्वेद में भी लिखे गए हैं।

‘रक्षोघ्न मंत्रों’ पर हम किसी अन्य दिन चर्चा करेंगे। आज चंद्रमा 6:33 AM के बाद से पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में है। यह बहुत ही शुभ नक्षत्र है। आईये, हम सभी पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र सूत्रम् को सुनकर होली का उत्सव मनाएं।

पूर्व फ़ाल्गुनी नक्षत्र-सूत्रम्

गवां॒ पतिः॒ फल्गु॑नीनामसि॒ त्वम् । तद॑र्यमन् वरुणमित्र॒ चारु॑ । तं त्वा॑ व॒यग्ं स॑नि॒तारग्ं॑ सनी॒नाम् । जी॒वा जीव॑न्त॒मुप॒ संवि॑शेम । येने॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ सञ्जि॑ता । यस्य॑ दे॒वा अ॑नुस॒ंयन्ति॒ चेतः॑ । अ॒र्य॒मा राजा॒‌உजर॒स्तु वि॑ष्मान् । फल्गु॑नीनामृष॒भो रो॑रवीति ॥

gavāṃ patiḥ phalgu’nīnāmasi tvam | tada’ryaman varuṇamitra cāru’ | taṃ tvā’ vayagṃ sa’nitārag’ṃ sanīnām | jīvā jīva’ntamupa saṃvi’śema | yenemā viśvā bhuva’nāni sañji’tā | yasya’ devā a’nusaṃyanti ceta’ḥ | aryamā rājā‌உjarastu vi’ṣmān | phalgu’nīnāmṛṣabho ro’ravīti ||

 

 

ऊँ तत् सत् ।।

Anish Prasad

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