आदित्यहृदयम्

आदित्यहृदयम् सूर्य को समर्पित एक शक्तिशाली मंत्र है। इसे सुनना अत्यन्त लाभकारी है। इसका उल्लेख रामायण के युद्ध काण्ड (६.१०५) में मिलता है। ऋषि अगस्त्य ने भगवान राम को अपनी थकान हटाने और रावण को हराने के लिए यह सुनाया था।

{पहली बार प्रकाशित- जनवरी ११, २०१८, संशोधन किया गया- अगस्त २२, २०२०}

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The image is a representation of आदित्यहृदयम् or Aditya Hridaya Stotra

आदित्यहृदयम् या आदित्य हृदय स्तोत्र या आदित्य हृदय स्त्रोत का उपयोग उपचारात्मक ज्योतिष में एक शक्तिशाली मंत्र के रूप में किया जाता है। खासकर तब जब ग्रहों की स्थितियों के कारण आई बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक ऊर्जा की कमी महसूस होती है। इसके अलावा, सूर्य संबंधी बीमारियों के लिए, आदित्यहृदयम् का जाप जादू की तरह काम करता है।

आदित्य हृदय स्त्रोत के लाभ:

इस दिव्य मंत्र के अनेक लाभ हैं। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि इसे सुनने से न सिर्फ़ आध्यात्मिक स्तर पर आत्मिक लाभ मिलता है अपितु इस मंत्र के जाप से चहुँ और सकारात्मकता का प्रवाह होता है। आदित्य हृदय स्तोत्र का सीधे सूर्य से संबंध है, जो कि सारे ब्रह्माण्ड का उर्जा स्त्रोत है।

आदित्यहृदयम् के निरंतर जाप से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-

आदित्यहृदयम् का जाप हमें सदा उर्जावान रखता है-

हमारे भीतर हर समय एक जद्दोजहत या अन्दरूनी लड़ाई चलती रहती है, जिसमें हमें भीतर से दैवीय ऊर्जाओं का आह्वान करके बुराई को हराना होता है। हमारे आस-पास की नकारात्मकताएं हमारे ऊर्जा संसाधनों को नष्ट करती हैं जिसके परिणामस्वरूप हमें थकान होती है। आदित्यहृदयम् को सुनकर हम अविश्वसनीय ऊर्जाओं के साथ वापस लौटते हैं।

आदित्यहृदयम् का जाप बीमारीयों में बहुत फायदेमंद है:

जो लोग किसी भी बीमारी से जूझ रहे हों, उन्हें आदित्यहृदयम् सुनने से बहुत लाभ मिलता है। यदि आप किसी भी तरह की बीमारी के लिए दवा लेते हैं, तो यह व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि आदित्यहृदयम् स्तोत्रम सुनने से, वह दवाओं बेहतर असर करना शुरु कर देती हैं। इसके अलावा, बीमारी से ठीक होने के बाद भी, आम तौर पर, हम कमजोर महसूस करते हैं। आदित्यहृदयम् स्तोत्रम पुन: हमें कायाकल्प करने में मदद करता है।

आदित्यहृदयम् के जाप से निर्णय लेने में मदद होती है:

यदि हम आदित्यहृदयम् को नियमित रूप से सुनें तो हमारे जीवन में बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। हमारे पेशे में, हम अक्सर कठिन चुनौतियों का सामना करते हैं। कई परिस्थितियाँ आती हैं जब निर्णय लेने में साहस की आवश्यकता होती है। आदित्यहृदयम् का जाप भीतर छिपी हुई आंतरिक शक्तियों को बाहर निकालता है और मन के दृष्टिकोण को व्यापक बनाता है जिससे समस्याग्रस्त स्थितियों में प्रभावी निर्णय लेने में बहुत सहायता मिलती है।

आदित्यहृदयम् का जाप एक प्रतिरक्षा या immunity बूस्टर है:

तनाव में वृद्धि प्रतिरक्षा या immunity को प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप, हम विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होते हैं। आदित्यहृदयम् स्तोत्रम् का नियमित रूप से सुनना तनाव का एक शक्तिशाली मारक है। इसलिए यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिरक्षा या immunity की वृद्धि में योगदान देता है। विशेष रूप से COVID-19 के वर्तमान समय में, आदित्यहृदयम् मंत्र को सुनाना या सुनना एक प्रतिरक्षा या immunity बूस्टर के रूप में बहुत सहायक होगा। यह मंत्र हमारी मनोदशा को संबल देता है, हमारा mood ठीक करता है, जो प्रतिरक्षा या immunity बढ़ाने में कारगर है।

सूर्य देव से आध्यात्मिक जुड़ाव को आदित्य ह्रदय स्त्रोत का जाप मजबूत करता है:

हमारा जीवन एक tripod यानि तिपाई पर खड़ा है- इस तिपाई के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक पैर हमें सम्हाले रखते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि विश्व में फ़ैले हुए तनाव और नकारात्मकता के कारण, हमारा आध्यात्मिक पाया कमज़ोर पड़ता रहता है। आदित्यहृदयम् के नियमित पाठ से जीवन की तिपाई का आध्यात्मिक पैर मजबूत होता है, मन के विचारों में स्थिरता आती है और सम्पूर्ण जीवन को एक संतुलन मिलता है।

आइए ऋषि अगस्त्य द्वारा प्रदान की गई कायाकल्प की इस शक्तिशाली विधि – आदित्यहृदयम् या आदित्य ह्रदय स्त्रोत को सुनें। इसमें लगभग साढ़े छह मिनट का समय लगेगा। हम आराम से बैठें या आराम से लेटें। इसके अलावा, बेहतर होगा कि हम अपनी आँखें बंद रखें। चेष्टा करें िक चेहरे की मांसपेशियों में तनाव नहीं हो और चेहरा बिना तनाव या खिंचाव के हो।

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(नोट: मुख्य स्तोत्रम में ‘फलश्रुति’ से पहले के श्लोकों को केवल शैक्षणिक सुविधा और सीखने के लिए मैंने चार भागों में विभाजित किया है। ऐसा कोई विभाजन मूल ग्रंथों में नहीं दिया गया है।)

प्रथम भाग:

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्

रावणं चाग्रतो द्रष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ।।१।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टमभ्यागतो रणम्

उपागम्याब्रवीद्राममगस्तयो भगवान् ऋषिः ।।२।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्

येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ।।३।

आदित्यह्रदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्

जयावहं जपन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ।।४।

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्

चिन्ताशोकप्रशमनमायुवर्धनमुत्तमम् ।।५।

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्

पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ।।६।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः

द्वितीय भाग:

एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः ।।७।

एष ब्रह्नमा विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः

महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपांपतिः ।।८।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरूतो मनुः

वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ।।९।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्

सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ।।१०।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्

तिमिरोन्मथनः शम्भुस्तवष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ।। ११।

हिरण्यगर्भः शिशरस्तपनो भास्करो रविः

अग्निगर्भोदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ।। १२।

त्रितीय भाग:

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ।।१३।

आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः

कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ।।१४।

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तु ते ।। १५।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ।।१६।

जयाय जयभद्राय हर्येश्वाय नमो नमः

नमो नमः सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नमः ।।१७।

नम उग्राय वीराय सांरगाय नमो नमः

नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ।।१८।

चतुर्थ भाग:

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ।।१९।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ।।२०।

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे

नमस्तमोभिनिघ्नाय रवये लोकसाक्षिणे ।।२१।

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ।।२२।

एष सुप्तेषु जागृति भूतेषु परिनिष्ठितः

एष एवाग्निहोत्रं फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ।।२३।

वेदाश्च ऋतवश्चैव ऋतुनां फलमेव

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ।।२४।

फलश्रुति:

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु

कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ।। २५।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्

एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्यसि ।।२६।

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि

एवमुक्तवा तदागस्तयो जगाम यथागतम् ।।२७।

एतत्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोभवत्तदा

धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ।।२८।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्तवा तु परं हर्षमवाप्तवान्

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ।।२९।

रावणं प्रेक्ष्य ह्रष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्

सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोभवत् ।।३०।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रह्रष्यमाणः

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्तवरेति ।।३१।

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ऊँ तत् सत् ।।

Anish Prasad

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